भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून की अरब शाखा
पिछले अध्याय में हमने जाना किस प्रकार ITCZ जून के माह में थार तक खिसक गया है क्योंकि अब सूर्य कर्क रेखा पर लंबवत चमक रहा है थार में निम्न दवाब और हाई टेम्प्रेचर बन चूका है फेरल के नियम के अनुसार अब दक्षिण से आने वाली या हिन्द महासागर से आने वाली व्यापारिक पवन उस ITCZ में आना चाहती है जिसका लक्ष्य थार का रेगिस्तान है.भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून की अरब शाखा की चाल को देखते हैं.
कृपया पिछला मानसून अध्याय जरूर देखें लिंक पर जाये https://padhailelo.com/mansun-origion-and-onset/
दक्षिणी पश्चिमी मानूसन का कटघरा
अगर हम कभी भारत के पडोसी देशो और उनकी तल क्षेत्र को प्यार से निहारे इसे निहारने के लिए प्रकृति की दृष्टि चाहिए न की मानव द्वार खींची गई लकीरें जो देशो की सीमा बनती है. पाकिस्तान में सुलेमान की पहाड़िया, अफगानिस्तान में हिन्दू कुश की पहाड़िया, पूर्व में बगलादेश का सपाट मैदान उत्तर में भारत के पिताजी हिमालय पूर्व में चले तो नागा लैंड की नागा पटकोई की पहाड़िया, मेघालय में शिलॉन्ग की गौरा जयंती घासी पहाड़िया, म्यांमार की अरकान पहाड़िया ऐसा लगता है की थार का मरुस्थल मानसूनी हवाओ को आकर्षित कर रहा है और यह सभी पर्वत उसको निकलने का रास्ता नहीं देना चाहते, एक आवारा बादल को अपने जाल में फसाना चाहते हैं।
भारतीय मानसून की अरब शाखा
आइये हम पहले भारतीय मानसून की अरब शाखा को देखे या उसे भारत के पर्वतो और पहाड़ो या प्रकृति के बनाये हुए कटघरे में डालें।
हमने जाना की यह नमी युक्त पवने भारत में दो रास्तो से आती हैं एक अरब सागर दूसरा बंगाल की खाड़ी, चूँकि वेस्टर्न घाट पर्वत (पश्चिमी घाट पर्वत ) एक खड़ा कगार है जो की केरल से लेकर महाराष्ट्र तक एक लाइन में खड़ा है इसलिए भारत में प्रवेश करते हुए वह सबसे पहले इससे केरल के हिस्से में टकरा जाती है वेस्टर्न घाट की सबसे ऊँची चोटी अनाईमुडी और दोदाबेटा.
दूसरी ओर ईस्टर्न घाट पर्वत अधिक कटा फटा है, बंगाल की खाड़ी शाखा वाली पवन इसके सामान्तर निकल जाती है और इसमें वेस्टर्न घाट के मुकाबले कम ऊँची चोटियां हैं. यही कारण है की एक ओर जहां केरल का मालाबार तट और केरल जो कि वेस्टर्न घाट के पश्चिम में स्थित है वहां पर्याप्त वर्षा होती है दूसरी ओर उससे कुछ किलोमीटर दूर या वेस्टर्न घाट के पूर्व में पर्याप्त बारिश नहीं हो पाती जिसमे तमिल नाडु और कोरोमंडल तट भी शामिल है. कृपया भारत के प्राकृतिक नक़्शे को निहारे।
प्रथम श्रेणी की मानसूनी पवन
अरब सागर शाखा की जोशीली और प्रथम श्रेणी की ताकतवर पवन वेस्टर्न घाट के पश्चिम से टकराकर ऊँची चोटियों पर चढ़ जाती है और वहां खूब जमकर बरसती हैं। यहाँ ऊंचाई के अनुसार वर्षा करती है चूँकि पश्चिमी घाट पर्वत दक्षिण में उठा हुआ है इसलिए अनाईमुडी चोटी पर ३०० सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा होती है. दोदाबेटा नीलगिरि पर २७० सेंटीमीटर (केरल ) कुद्रूमुख और मुलांगीरीपहाड़ की चोटी (कर्नाटक) पर २५० सेंटीमीटर लगभग इस प्रकार महाराष्ट्र में महाबलेश्वर और कंसु बाई चोटी पर लगभग २०० सेंटीमीटर बारिश वार्षिक हो जाती है.
जितना ऊँचा पहाड़ उतनी अधिक वर्षा
यहाँ देख सकते हैं की पहाड़ो की ऊंचाई के साथ साथ वर्षा की मात्रा भी घटती जा रही है. जितना ऊँचा पहाड़ उतनी अधिक वर्षा। इसलिए हर किसी को अपनी ऊंचाई बढ़ानी चाहिए पहाड़ कुछ यही संदेश देना चाहते है.यह नजारा पश्चिमी घाट के पश्चिम किनारे का है पूर्वी किनारा बारिश नहीं पाता क्योंकि पवन चढ़ते समय पहाड़ पर संघनन करती है इसलिए वर्षा होती है उतरते समय बर्षा नहीं कर पाती (adiabetic ताप ह्रास के कारण).
दूसरे दर्जे की पवन (विंड गैप पवन)
कुछ पवन दूसरे दर्जे की होती हैं वह पहाड़ पर चढ़ नहीं पाती या चढ़ना नहीं चाहती वह पश्चिमी घाट में स्थित कुछ गैप हैं जैसे थालघाट भोरघाट पालघाट सेनगोट्टा गैप यह दूसरे दर्जे की पवने इन गैप के अंदर घुस जाती हैं और इसके पूर्व में ४० से ८० सेंटीमीटर वर्षा कर देती इसलिए यहाँ पर आम इलायची कॉफी काजू इत्यादि हो ही जाता है. इसलिए यह दोयम दर्जे की मानसूनी पवन इन गैप के जरिये तमिलनाडु में भी कुछ वर्षा कर देती हैं और कुछ हद तक वेस्टर्न घाट के वृष्टि छाया क्षेत्र में भी वर्षा कर देती हैं। इन गैप को विंड गैप भी कहा जाता है.
तीसरे दर्जे की पवन
कुछ पवन तीसरे दर्जे की होती हैं वह न तो पहाड़ो पर चढ़ती है न ही इन गैप में घुसती हैं वह पश्चिमी घाट के पचिमी किनारे से रगड़ रगड़ कर चलती हैं जैसे भैंस या सूअर दिवार से रगड़ कर चलते है. यहाँ फिर फेरल के नियम का उललंघन होता है अब पवन उत्तर पूर्व (फेरल का नियम ) के बजाय उत्तर पश्चिम चलने लगती है. इसका कारण भारत की टोपोग्राफी (तलरूप ) या बल का टकराव (फ्रिक्शनल ऑफ़ फ़ोर्स) है.
ताप्ती की घाटी की तीसरे दर्जे की पवन
तीसरे दर्जे की यह पवने सबसे पहले ताप्ती की घाटी मुहाने के पास डेल्टा बना हुआ उसमे घुस जाती हैं वहां से भरपूर नमी लेकर बैतूल के पठार से होते हुए महादेव की पहाड़ियों में ,यही पर धूपगढ़ की पहाड़ियों पर लगभग १५० सेंटीमीटर वर्षा कर देती हैं. ताप्ती घाटी के एक उत्तर की तरफ सतपुड़ा की पहाड़ी है दक्षिण की तरफ गावेलकर की पहाड़ी है यह भैसं या बादल जो रगड़ रगड़ कर यहाँ तक आया है कहाँ अधिक वर्षा करेगी. जाहिर सी बात है सतपुड़ा की तरफ क्योंकि इस पवन की असली प्रवर्ति तो तो उत्तर पूर्व ही है (फेरल का नियम ).
अब यह अरब सागर की तीसरे दर्जे की पवन अपनी बिछड़ी बहन का यही इंतजार करेगी जो बंगाल की खाड़ी के रास्ते से आने वाली है.
नर्मदा की घाटी की तीसरी दर्जे की पवन
तीसरे दर्जे की पवन की एक शाखा नर्मदा की घाटी में घुस जाती है वहां से पर्याप्त नमी लेकर पहुँच जाती है अमरकंटक की पहाड़ी पर लगभग १५० सेंटीमीटर वर्षा वार्षिक कर ही देती है. जैसे ही यह अमरकंटक के उत्तर में जाएँगी वहां बारिश नहीं होगी कारण adiabetic ताप ह्रास कहता है की पवन पहाड़ से उतरते हुए बारिस नहीं कर पाती अभी हमने पश्चिमी घाट पर्वत पर यह देखा था. उत्तर प्रदेश का मिर्ज़ापुर वहीँ पर है. जो की भारत के छ सूखाग्रस्त जिलों में से एक है.
अब एक प्रश्न यह बनता है यह तीसरे दर्जे की यह शाखा विंध्य पर्वत के दक्षिणी कगार पर अधिक वर्षा करेगी या सतपुड़ा की उत्तरी कगार पर जाहिर सी बात है विंध्य के दक्षिणी कगार पर क्योंकि यही तो इस पवन की पवर्ती है दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व (फेरल का नियम). अभी तक यह पवन मज़बूरी में चल रही थी पश्चिमी घाट के कारन।
तीसरे दर्जे की पवन (खम्बात की खाड़ी)
इसी तीसरे दर्जे की पवन की एक शाखा खम्बात की खाड़ी में घुस जाती है वह से माहि नदी में, वहां से चंबल नदी में और इंतजार करती है पठार के कगार पर. अपनी बिछुड़ी बहन का जो अभी बंगाल की खाड़ी से आने वाली है
गुजरात की पहाड़ी से टकराव
गुजरात में कई पहाड़िया है जैसे गिर गिरनार इत्यादि अरब सागर की शाखा इन पहाड़ियों से टकराती है. इन पहाड़ियों की दिशा पूरब से पश्चिम है अर्थार्त मानसूनी हवा के ठीक सामने अब बताइये क्या बारिश होगी या नहीं। इसकी दक्षिणी किनारे पर लगभग २०० से २५० सेंटीमीटर वर्षा होती है जिसे सौराष्ट्र कहते हैं।
इन पहाड़ियों के उत्तर में वृष्टि छाया क्षेत्र पड़ जाता है. वहीँ पर सुरेंद्र नगर जिला है जो भारत का एक सूखाग्रस्त जिला है.
अरावली के गुरु शिखर पर बारिश
अब हवाएं उत्तर में चल पड़ी कछ के रन की तरफ वहां से नमी मिल गयी सामने पड़ गया अरावली पर्वत के दक्षिण में सबसे ऊँची चोटी गुरुशिखर, जो की माउन्ट आबू पर है, वहां लगभग १५० सेंटीमीटर बारिश हो जाती है. इसलिए अरावली के उत्तर में बारिश नहीं होगी ।
चूँकि अब हवाएं अरावली के समान्तर चल पड़ी हैं अरावली उनके सामने कोई अवरोधक का काम नहीं करता (ध्यान रखे अरावली तब से मौजूद हैं जब यह मानसून इस अक्षांश पर नहीं था, धरती की स्थापना के आरम्भिक वर्ष या यूँ कहे की पृथ्वी पर जीवन ही नहीं था) इसलिए अरावली को राजस्थान में बारिश न होने देना का दोष नहीं देना चाहिए।
प्रकृति का फ़क़ीर बेटा थार का रेगिस्तान
दक्षिणपश्चिमी मानसुंन का केंद्र बिंदु
असली और महत्व पूर्ण कारण यह है कि यहाँ पर कनवक्शनल करंट सबसे ज्यादा है क्योंकि सूर्य यही पर लंबवत है (कर्क रेखा ) तापमान ४८ डिग्री है जो ऊपर उठकर इन हवाओ का भी टेम्प्रेचर बढ़ा देता है जिसे बादलो में संघनन किर्या नहीं हो पाती और मानसूनी हवाएं भी तीसरे दर्जे की हैं और वह भी बूढी। इसलिए यहाँ से बिना बरसे ही चले जाति है इसलिए यह शुष्क क्षेत्र है. यही तो है प्रकृति का वह फ़क़ीर बेटा थार का रेगिस्तान जो दक्षिण पश्चिमी मानसुंन का केंद्र बिंदु है.
बूढी मानसूनी हवा
अब यह बूढी मनसुनि हवा है इसमें नमी नहीं रही, चली जा रही है कुछ ताकत मिल जाये मिल गयी ताकत यहीं पर है राजस्थान की इंदिरा कनेल और उससे हुई सिंचाई के क्षेत्र से कुछ नमी पाकर प्रसन्न हो जाती है. अब वह शिमला में इंतजार करेगी अपनी बिछुड़ी बहिन का जो बंगाल की खाड़ी शाखा से आने वाली है. कृपया इसका रास्ता देखे कहाँ हिन्द महासागर कहाँ शिमला। इस को यहाँ तक लाने का श्रेय पश्चिमी घाट और रस्ते में पड़ने वाले जल स्त्रोत जैसे खम्बात की कड़ी और इंदिरा कनेल (राजस्थान ) को ही जाता है. बेचारी आगे जाना छाती है पर हिम्मत नहीं हो रही हिमालय जैसे ऊँचे पहाड़ पर चढ़ जाये।
हिन्द महासागर से निकली ऊर्जा
इस प्रकार हमने जाना की किस प्रकार भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून की अरेबियन शाखा जो केरल से लेकर शिमला तक भारत को जल से भिगोने का कार्य करती है जिसमे भारत के पर्वत और पठार उसको काबू में रखते हैं. अथवा उसकी यांत्रिकी क्या है.
भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून को संक्षेप में समझे तो वास्तव में यह हिन्द महासागर से पृथ्वी के घूर्णन द्वारा निकली एक ऊर्जा है जिसे भारत के पर्वत, पठार, जल स्त्रोत और थार का सूखा क्षेत्र इसे आमंत्रित और नियंत्रित करते है जिससे भारत और पडोसी देशों में खुशहाली आती है. ऊर्जा का सकरात्मक नियंत्रण कितना जरुरी है भारत के पर्वत और पठार और थार का मरुस्थल तो यही सन्देश देते हैं मानव इस सन्देश को कितना समझ पाते हैं यह तो मानव ही जाने।
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