भारतीय मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखा
बंगाल की खाड़ी शाखा
अभी हमने देखा की किस तरह भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून की अरब सागर शाखा ने भारत में प्रवेश किया था तिथि १ जून की थी कन्या कुमारी पर इस मानसून की एक शाखा बंगाल की खाड़ी की तरफ अलग हो थी या बिछुड़ गयी थी इसकी मंजिल भी ITCZ (Intertropical Convergence Zone) ही है. हाँ रास्ता अलग है. इसकी भारत में प्रवेश करने के तरीके को समझने की कोशिश करते हैं.
उच्च तापमान निम्न वायु दवाब
पिछले मानसून के अध्याय में हमने समझा (please see link https://padhailelo.com/arabinan-branch-india-mansun/) की किस प्रकार भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून का २३ मार्च को ऑनसेट हुआ था जब सूर्य भूमध्य रेखा पर लंबवत था वहां निम्न दवाब का क्षेत्र बना था इसलिए वहां पर निम्न दवाब और उच्च तापमान का क्षेत्र विकसित हुआ था सूर्य के उत्तरायण होने के कारन वह ITCZ (Intertropical Convergence Zone) का क्षेत्र धीरे धीरे भारत की ओर खिसकने लगता है. जून को सूर्य कर्क रेखा पर लंबवत होता है जाता है और ITCZ थार के रेगिस्तान तक पहुँच जाता है. यहाँ पर अब निम्न दवाब का क्षेत्र बन चूका है. ध्यान रखे सूर्य कर्क रेखा और मकर रेखा के बीच ही भ्रमण करता है.
यहां यह भी उल्लेखनीय है की मानसून (प्रकृति) को समझने में नए नए शोध से नए-२ विचार जुड़ते रहे हैं. यहाँ सर्वमान्य अवधारणाओं के आधार पर ही मानसून को समझने की कोशिश की जा रही है. निम्न चार्ट में तीर में वायु की दिशा दिखाई गयी है. दक्षिणपूर्वी व्यापारिक पवन फेरल के नियम के अनुसार उत्तरी गोलार्ध या ITCZ में अपने बायीं ओर मुड़कर दक्षिणी पश्चिमी मानसून का रूप ले लेती हैं.
उत्तरी गोलार्ध इंडिया
दक्षिणी पश्चिमी मानसून
निम्न वायुदाब पेटी या निम्न दवाब और उच्च तापमान <<<< <<<< <<<<< <<<< <<<< फेरल का नियम
साउथ ईस्ट व्यापारिक पवन
दक्षिणी गोलार्ध
चक्रवातों का निर्माण
इससे पहले मई में चलते हैं जैसे ही भूमध्य रेखा से यह पवन अंदमान निकोबार की तरफ मुड़ती है वहां मानसून की तिथि के अनुसार मई में ही बारिश हो जाती है वहां पर भी कुछ पहाड़ हैं. यहां अरकान (म्यामांर) की पहाड़ियों से टकराकर भारत की और रुख कर लेता है . जैसे जैसे ITCZ उत्तर खिसकेगा वैसे वैसे बंगाल की उत्तरी पूर्व व्यापारिक पवने और दक्षिणी पश्चिमी मानसून की पवन आपस में टकराने से वहां चक्रवातो (साइक्लोन) का निर्माण हो जाता है. दूसरा पूर्वी जेट धाराएं भी इसमें सहायक होती हैं. इन चक्रवातों का निर्माण बंगाल की खाड़ी में अधिक होता है अरब सागर में बहुत कम. इसका एक कारण है यह भी है कि विश्व के महाद्वीपों के पूर्वी किनारे पश्चिमी किनारों की अपेक्षा अधिक गर्म हैं.
साइक्लोन अपने एक्सिस पर एंटी क्लॉक घूमता है
एक भूगोलिक नियम के अनुसार उत्तरी गोलार्ध में साइक्लोन अपने एक्सिस पर एंटी क्लॉक घूमता है और उसकी दिशा होती है पूर्व से पश्चिम. अर्थार्त निशाना प्राद्वीपिया भारत का पूर्वी घाट पर्वत या पूर्वी किनारा, विशेषकर उड़ीसा, आंध्रप्रदेश और पश्चिम बंगाल के तटीय किनारे । यहाँ पर पूर्वी घाट पर्वत एक प्रहरी की तरह खड़ा है जो इन चक्रवातों से भारत की रक्षा करता है
पूर्वी घाट कई जगह से कटा फटा है इसका कारण है कि प्रायद्वीपीय भारत (दक्षिण भारत ) की नदियों द्वारा बनाये गए डेल्टा और नदी घाटियां. पूर्वी तट से टकराने के बाद यह चक्रवात इन नदी घाटियों के रास्ते घुस जाते है वहां बारिश होने का कारण भी बनते हैं। यदि इसकी रफ़्तार अधिक होगी यह जान धन की हानि का कारण भी बनते है. अभी हाल ही में मई में ही पश्चिम बंगाल उड़ीसा के तट पर एक विनाशकारी चक्रवात आया था.
क्लाउड ब्रस्ट (बादल का फटना )
कई बार यह चक्रवात तमिलनाडु में कावेरी के मुहाने से घुसकर इसके उद्गम ब्रह्मगिरि पहाड़ी (कर्नाटक) की ओर पहुँच जाते है अगर वहां पहले से ही अरब सागर शाखा मौजूद हो दोनों बिछुड़ी बहने दहाड़ कर मिलेंगी अर्थार्त क्लाउड ब्रस्ट मूसलाधार बारिश जैसे किसी ने कई ड्रम पानी उड़ेल दिया हो. पिछले मानसून के एक अध्याय में हमने मानसून ब्रस्ट का जिक्र किया था. कृपया लिंक पर जाये https://padhailelo.com/mansun-origion-and-onset/
मानसून ब्रस्ट में एक ही दिशा की मानसूनी पवन पहाड़ से टकराती है. जबकि क्लाउड ब्रस्ट में दो मानसूनी पवन टकरा जाती हैं यह घटना अक्सर पहाड़ो पर होती है.
तमिलनाडु और कोरोमंडल तट
यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है की पश्चिमी घाट पर अरब शाखा से सीधा टकराव होने के कारण बारिश हुई थी यहाँ पूर्वी घाट दक्षिण पश्चिमी मानसून के समानांतर है इसलिए बंगाल की खाड़ी की ओर जाने वाली मानसून हवाएं पूर्वी घाट से बिना टकराये चली जाती है इसलिए तमिलनाडु और कोरोमंडल तट पर वर्षा नहीं हो पाती.
इंतजार रेखा
पिछले अध्याय में अरब सागर की एक शाखा जो की धूपगढ़ की पहाड़ियों पर इंतजार में थी या शिमला में इंतजार में थी, यहाँ अक्सर क्लाउड ब्रस्ट देखने को मिल जाते हैं. इस इंतजार रेखा पर क्लाउड ब्रस्ट देखा गया है . इसी प्रकार का नजारा हमें कृष्णा नदी के उद्गम महाबलेश्वर (महाराष्ट्र) में, भी देखने को मिल जाये तो अचम्भा नहीं होना चाहिए. इंतजार रेखा भारतीय मानसून का एक नया ट्रेंड है. यहाँ मानसूनी पवन कुछ देर तक इंतजार करती है जो मानसून विछेद का कारण बनती है.
चक्रवाती वर्षा या मानसूनी वर्षा
गोदावरी नदी घाटी, ब्राह्मणी नदी घाटी, स्वर्ण रेखा नदी रांची का पठार (झारखण्ड), महानदी घाटी के रास्ते हजारीबाग पठार (छत्तीसगढ़ ) दामोदर नदी घाटी छोटा नागपुर पठार (झारखण्ड). इन प्रायद्वीपिया नदियों के सहारे बंगाल की खाड़ी की शाखा चक्रवातों का सहारा लेकर इनकी बनाई गयी घाटियों में घुस जाती है और इन सभी घाटियों में घुसकर लगभग १५० सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा कर देती है.
चक्रावतो की गति समुद्र में तेज होती है स्थल पर पहुँच कर मंद हो जाती है या समाप्त हो जाती है कुछ ताकतवर चक्रवातों को छोड़कर। इसलिए चक्रवात पूर्वी घाट की नदी घाटी में बारिश करवाने में सहायक होते है वही दूसरी ओर ताकतवर चक्रवात जन धन की हानि का कारण भी बन सकते हैं।
कोइ बारिश नहीं फिर भी बाढ़
अभी हमने १ जून को जो नजारा केरल की अनाईमुडी चोटी अरबसागर शाखा पर देखा था वही नजारा लगभग उसी समय मेघालय में बंगाल की खाड़ी की शाखा द्वारा होता है सबसे पहले गारो जयंती घासी की पहाड़िया इन पहाड़ियों से टकराकर एक शाखा हुगली नदी के सहारे पश्चिम बंगाल में मुड़ जाती है और एक शाखा वहां से बांग्लादेश को पार कर जाती है बांग्लादेश इनसे बारिश नहीं करवा पाता चक्रवातों या अपवादों को छोड़कर। कारण बांग्लादेश में कोई कोई पर्वत नहीं है. फिर भी वहां परचंड बाढ़ आती है. बांग्लादेश एक ऐसा देश है जो बारिश के मामले में अत्यंत पिछड़ा है फिर भी वहां बाढ़ आती है इसका कारण है इसके पड़ोस में मेघालय का पानी यही जाता है जो सबसे अधिक बारिश वाला राज्य है और यहाँ ब्रह्मपुत्र और मेघना नदियों का विस्तृर्त जल क्षेत्र.
सर्वाधिक वर्षा वाला राज्य
मेघालय की यह पहाड़िया सामने ९० डिग्री का कोण बनाये खड़ी हैं एक कीप की तरह हैं मानसूनी हवा को ऐसा फसांती हैं. जैसा कीप में मुहाने पर घुसने का तो बड़ा दरवाजा है लेकिन निकलने का एक छोटा रास्ता जब यह इन पहाड़ियों से टकराती है, भारत तो छोड़ो पृथ्वी ऐसी बारिश को तरस जाती है. यहाँ विश्व की सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र भी है मासिनराम (चेरापूंजी) जहां लगभग ११०० सेंटीमीटर वर्षा दर्ज होती है. अधिकतर वर्षा यहाँ सुबह ही देखी जाती है. यह भी एक कौतुहल का विषय है. मेघालय में लगभग ४०० सेमी वार्षिक वर्षा होती है.
प्राकर्तिक जाल
बंगाल की खाड़ी की एक शाखा घुस जाती है मेघालय की पहाड़ियों के बाजु में सुरमा घाटी से असम की ब्रह्मपुत्र घाटी में वहां से और भी अधिक नमी ग्रहण करती है. उसके बाद अरुणाचल प्रदेश में दिहांग नदी की नमी, अब इनके सामने ही असम और अरुणाचल में स्थित हिमालय है, पीछे मेघालय की पहाड़िया और पूर्व के नागलैंड की नागा पटकोई और म्यांमार की पहाड़िया। यह पर्वतो द्वारा बनाया बनाया गया प्राकर्तिक जाल इन मानसूनी पवनो को ऐसा फंसाता है जिनसे निकलना मुश्किल हो जाता है अब तो इन्हे यही चक्कर लगाते रहना पड़ता है. यह एक ऐसी कोठरी है जिसमे घुसा तो जा सकता है पर निकला नहीं जा सकता. इस कारन इस क्षेत्र में २५० से ३०० सेमी वार्षिक वर्षा हो जाती है।
मानसून की तिथियों में देरी
उत्तरी भारत में जो पिछले कुछ वर्षो में मानसून की तिथियों में देरी हो रही है वह मानसून का कुछ देर पूर्वी राज्यों में ठहरना और इंतजार रेखा पर मानसून का मंद पड़ना भी है . भारत की नदियों में बढ़ता प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग भी इसका एक कारण हो सकता है. यह सत्य है की भारत में मानसून तिथियों में और कुल वर्षा की मात्रा में उत्तरोत्तर गिरावट दर्ज की जा रही है.
सुन री पवन पवन पुरवैया
हिमालय के सहारे यह पवन अपने लक्ष्य थार के मरूस्थल की और चल पड़ती है अर्थार्त पूर्व से पश्चिम की ओर उत्तरी भारत का हिंदी सिनेमा तो यही पर आँख गढ़ाए बैठा है बना दिया इसे पुरवैया और कितने हिट गाने बना दिए हैं, इस पुरवैया पर कृपया यह भी खोजे। उत्तर भारत के पुराने ग्रामीण लोग पुरवैया का स्वागत करने के लिए तैयार हैं उनके लिए तो यह आज भी वही सदियों पुरानी पुरवैया है जिसका अनुभव उन्होंने पीड़ी दर पीड़ी किया है जिसका हिंदी सिनेमा में भरपूर इस्तेमाल किया गया है. दक्षिणी पश्चिमी मानसून जैसा शब्द तो अभी किताबों में बना है .
भारत का सरताज हिमालय
दक्षिणी पश्चिमी मानसूनी की पवन को हिमालय ने पुरवैया बना दिया है इसलिए कहा जाता है की हिमालय ग्रीष्मकालीन भारतीय मानसून को एक विशेषता प्रदान करता है. इसलिए भारत में हिमालय और पहाड़ो को ईश्वर तुल्य पूजनीय माना जाता है.
कड़ाके की बिजली

इस पुरवैया की असली परवर्ती तो अपने दाये चलना ही है (फेरल का नियम ) इसलिए यह हिमालय की शिवालिक पहाड़ियों पर सर्वाधिक बरसती है. रास्ते में पढता है कलकत्ता कुछ बारिश कर देती है लगभग १५० सेंटीमीटर उसके आगे बढ़ जाती है पटना में बारिश लगभग ११० सेंटीमीटर। यहाँ पर सोन नदी है जिसमे घुसकर यह सूखा क्षेत्र जिले मिर्जा पुर (उप्र) तक भी हलकी बारिश कर देती है. उसके आगे इलाहबाद (प्रयागराज ) लगभग १०० सेंटीमीटर यहाँ पर मानसून की दूसरी शाखा अक्सर इससे टकरा जाती है जिससे यहीं कड़ाके की बिजली चमकती है आकड़ो की माने तो बिजली गिरने से होने वाली सबसे अधिक मौते इलाहबाद (प्रयागराज ) के आसपास के २०० किमी क्षेत्र में ही होती हैं.
मथुरा में सबसे कम वर्षा
इसके आगे कानपूर में ७५ सेंटीमीटर और दिल्ली पहुँचते पहुंचते यह ६० सेमी वर्षा कर देती है. दिल्ली से आगे बढ़ने पर इस हवा की नमी समाप्त होने लगती है. इसी दौरान पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान खेतों में जायद की फसल बो देते हैं, उन्हें सींच भी देते हैं जिससे इन हवाओ को फिर से नमी मिल जाती है उत्तर प्रदेश में गोरखपुर में सबसे अधिक और मथुरा में सबसे कम वर्षा होती है.
थार हिमालय और तिब्बत के पठार का करिश्मा
अब यह पवन बूढी हो चुकी है सामने ही इसकी बिछड़ी बहन इंतजार में है जो अरब सागर शाखा से आयी थी शिमला के आसपास दोनों का मिलन होता है अगर इनमे ताकत होती है तो यह एक दूसरे से खूब जोश से मिलती हैं अर्थार्त क्लाउड ब्रस्ट लैंड स्लाइडिंग और अगर नहीं तो सोचती हैं अब हमारा कुछ नहीं होगा चलो पहाड़ के पार चलते हैं, पर हिमालय उन्हें वापस भेज देता है थार के रेगिस्तान के पास. थार के पास कन्वेक्शन करंट सबसे अधिक है इन हवाओ को और ऊपर उठा देता है उधर से हिमालय के अलबेडो और तिब्बत का पठार के हाई टेम्प्रेचर के कारन यह क्षोभमंडल (Troposphere) ( धरती से १०-१२ किमी उपर) पर चली जाती हैं.
मानसून की सक्रियता
क्षोभमंडल में बन जाती हैं जेट धाराये (लगभग १५०-२०० किमी प्रति घंटा) वहाँ से भूमध्य रेखा के १५ – २० अक्षांश पर दक्षिणी गोलार्ध में गिरती हैं. हिन्द महासागर में नहाकर भरपूर एनर्जी लेती है भूमध्य रेखा पार करते ही फेरल के नियम के अनुसार अपने बाये मुड़ जाती हैं और कहलाती है दक्षिण पश्चिमी मानसून की एक ऊर्जावान पवन जो मानसून को और त्रीव या सक्रिय कर देती हैं. यही चक्र चलता है जब तक ITCZ भारत में रहता है.
भारतीय कृषि का आधार
इस प्रकार हमने देखा की बंगाल की खाड़ी शाखा अरब सागर के मुकाबले भारत के अधिक क्षेत्र को जलमग्न करने में सफल होती है. कुछ सूखे प्रभावित क्षेत्रो को छोड़कर कुल मिला कर यह दोनों शाखाये पुरे भारत के ९० प्रतिशत हिस्सों को जल से भिगोने में सफल हो जाती है इसलिए भारत को मानसूनी जलवायु वाला देश भी कहा जाता है जो यहां की अच्छी कृषि का एक महत्वपूर्ण आधार बनती है. भारत की कृषि का ६० प्रतिशत इन मानसूनी वर्षा के पानी द्वारा सिंचाई पर पूर्णत निर्भर है. प्रायद्वीपीय भारत या दक्षिण भारत की नदियों में पानी का मुख्या स्त्रोत भी यही मानसूनी पवने हैं. भारत में वन क्षेत्रो और वन्य जीवो के लिए उपयुक्त वातावरण बनाने में भी यह सहायक होती है.
ऊपर आसमान को देखना
धीरे धीरे सूर्य दक्षिणायन होना शुरू हो जाता है इसके पीछे ITCZ का खिसकना भी शुरू हो जाता है भारत में सबसे पहले उत्तर पश्चिमी भारत (थार के रेगिस्तान) से यह खिसकता है. इनके पीछे आसमान के बादलों का लौटना भी शुरू हो जाता है. उत्तर भारत में यह घटना मध्य सितम्बर से लेकट दक्षिण (कन्या कुमारी) दिसंबर के प्रथम सप्ताह तक घट सकती है. अगर उत्तर भारत में है तो एक बार मध्य सितम्बर के आसपास अपने ऊपर आसमान को निहारना और लौटते बादलों को धन्यवाद देना शायद जाते हुए बादल भी तुम्हे देखकर मुकराने लगे।
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